भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र निर्बाध सचरण/भ्रमण की स्वतन्त्रता | Freedom of unrestricted movement throughout the territory of India
अनुच्छेद 19 (1) (घ) भारतीय नागरिकों को समस्त भारत में स्वतन्त्र रूप से भ्रमण करने का अधिकार प्रदान करता है। वह बिना किसी प्रतिबंध के भारत संघ के एक राज्य से दूसरे राज्य में जा सकता है और राज्य की सीमा के भीतर भ्रमण कर सकता है। इस प्रकार भारत का समस्त क्षेत्र नागरिकों के लिये एक इकाई के सदृश है। इसका मुख्य उद्देश्य प्रांतीयतावाद जैसी संकुचित भावना को समाप्त करके प्रत्येक नागरिक में राष्ट्रभक्ति की भावना की सृष्टि करना है।
निर्बन्धन के आधार - अनुच्छेद 19 खण्ड (5) के अन्तर्गत राज्य भ्रमण की स्वतन्त्रता पर निम्नलिखित आधारों पर युक्तियुक्त प्रतिबन्ध लगा सकता है।-
1- साधारण जनता के हित में;
2- किसी अनुसूचित आदिम जाति के हित के संरक्षण में। एन० बी० खरे बनाम दिल्ली राज्य के बाद में अपीलार्थी को तीन महीने के लिए दिल्ली राज्य से बाहर चले जाने का निष्कासन आदेश दिया गया। यह आदेश ईस्ट पंजाब पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट, 1949 के अन्तर्गत जारी किया गया था। प्रार्थी ने इस आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में एक पिटीशन दायर किया जिसमें उसने इस आदेश को दो कारणों से असंवैधानिक बताया। प्रथम, यह कि आदेश कार्यपालिका के व्यक्तिगत निर्णय पर आधारित था और दूसरा, यह कि अधिनियम ने निष्कासन की अवधि निर्धारित नहीं की थी। उच्चतम न्यायालय ने प्रार्थी के दोनों तर्कों को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि आदेश जारी करने के अधिकार को राज्य सरकार या किसी सरकारी आफिसर को देना अनुचित नहीं है, क्योंकि आपात्कालीन परिस्थितियों में इस प्रकार के व्यक्तिगत आदेश जारी करने की वांछनीयता किसी आफिसर के ऊपर छोड़े जाने से इन्कार नहीं किया जा सकता है। अफसर के निर्णय को अन्तिम बना देने से ही प्रतिबंध अयुक्ति- युक्त नहीं हो जाते हैं।
किन्तु इस प्रकार के कानून द्वारा कार्यपालिका अधिकारियों को मनमानी शक्ति नहीं प्रदान की जा सकती है। उदाहरण के लिए; एक ऐसे कानून को जो खतरनाक चरित्र वाले व्यक्तियों को किसी विशेष क्षेत्र से बहिष्कृत करने के आदेश का उपबन्ध करता है, उच्चतम न्यायालय ने अवैध घोषित कर दिया, क्योंकि यह कार्यपालिका अधिकारियों को मनमानी शक्ति प्रदान करता था। अधिनियम में इसकी कोई परिभाषा नहीं दी गई है कि खतरनाक चरित्र वाले व्यक्ति कौन हैं। ऐसी दशा में कोई नागरिक चरित्र वाला है या नहीं इसका निर्णय अधिकारियों पर है। देखिये – मध्य प्रदेश राज्य बनाम बलदेव " का निर्णय।
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम कौशल्या के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि एक वेश्या को एक विशेष स्थान से हटाना, बहिष्कृत करना और उसके भ्रमण के अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाना सामान्य जनता के हित में है।
इस अधिकार पर अनुसूचित आदिम जाति के हित पर भी प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य आदिम जातियों की सुरक्षा करना है जो अधिकतर आसाम प्रान्त में रहती हैं। इन जातियों की अपनी विशेष भाषा, रीति-रिवाज और प्रथायें हैं। ऐसी आशंका थी कि बाहर लोगों के साथ अनियन्त्रित मेल-जोल के कारण इन जातियों के ऊपर अवांछनीय प्रभाव पड़ सकता है। इसी उद्देश्य से इन क्षेत्रों में जाने-आने के लिये पूर्व अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है।
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